o god – Übersetzung – Keybot-Wörterbuch

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  39. Story of Ranka and ...  
Champakali asked Supreme God Kabir, “O God! What shall I do with this sinful property and money?” Supreme God Kabir said, “Daughter! Donate this hellish money.” Champakali went home and thought, “If I will donate the entire money, what will I eat? I do not have any other job.”
परमेश्वर कबीर जी से चम्पाकली ने पूछा कि हे भगवान! इस पाप की संपत्ति और रूपये का क्या करूं? परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि बेटी! इस नरक के धन को दान कर दे। घर पर जाकर चम्पाकली ने विचार किया कि यदि सर्व धन दान कर दिया तो खाऊँगी क्या? कोई कार्य और है नहीं। चम्पाकली सत्संग अधिक समय जाने लगी। एक दिन सत्संग में बताया गया कि:-
  38. Salvation of a Pros...  
That prostitute also came forward, and introduced herself to Gurudev ji. She said, “For the first time in 40 years of my life, I have heard such benevolent words. O God! Is welfare of a sinner like me also possible?
उपरोक्त अमृतवचन सुनकर वह बहन वैश्या जैसे गहरी नींद से जागी हो। कांपने लग गई। घर में ताला लगाकर सत्संग स्थल पर गई। पीछे ही महिलाओं की ओर बैठ गई। सत्संग समाप्त होने के पश्चात् आवाज लगी कि जो दीक्षा लेना चाहता है, वह आगे गुरू देव जी के पास आ जाए। कुछ स्त्राी तथा पुरूष उठकर आगे आए। वह वैश्या भी आई और गुरूदेव जी को अपना परिचय दिया और बताया कि मैंने तो 40 वर्ष की आयु में प्रथम बार ये उपकारी वचन सुनने को मिले हैं। हे परमात्मा! क्या मेरे जैसी पापिन का भी कल्याण संभव है? वैसे तो आप जी ने सर्व समाधान सत्संग में बता दिया, परंतु जब अपने घृणित जीवन की ओर झांकती हूँ तो ग्लानि होती है तथा विश्वास नहीं हो रहा कि मेरे जैसे अपराधी को क्षमा कर दिया जाएगा। परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि:-
  34. A Thief Never Becom...  
Thoughts were arising in her mind at short intervals that – “How will my daughter sustain herself? My daughter’s life is ruined. One cannot rely on brother-in-laws. Who will raise the children? O God! What has happened? Don’t know sin of which birth has come to the fore?”
उसका दामाद मृत्यु को प्राप्त हो गया था। लड़की के छोटे-छोटे बच्चे थे। वह बहुत चिंतित थी। रह-रहकर विचार उठ रहे थे कि बेटी का निर्वाह कैसे होगा? बेटी तो उजड़ गई। देवर-जेठ किसी के नहीं होते। बच्चो को कौन पालेगा? हे भगवान! यह क्या बनी? कौन-से जन्म का पाप आड़े आ गया? उपदेशी बहन भोजन बनाने लगी तो उसकी बहन उसकी सहायता करने लगी। अधिक भोजन उस बहन ने बनाया जिसका दामाद मर गया था। संत-भक्त खाना खाकर सो गए। सुबह भक्त ने गुरू देव जी से कहा कि हे गुरूदेव! आज रात्रि में निंद्रा के दौरान मन बहुत दुःखी रहा। जैसे मेरा दामाद मर गया। बेटी के छोटे-छोटे बच्चे हैं। उनकी बेहद चिंता सताती रही। इनका क्या होगा? कैसे निर्वाह होगा? गुरू जी ने अपनी शिष्या से पूछा कि बेटी! रात्रि का भोजन किसने बनाया था? उसने उत्तर दिया कि मेरी छोटी बहन आई है, उसने बनाया था। संत ने पूछा कि उसको कोई कष्ट है क्या? शिष्या ने उत्तर दिया कि गुरूदेव! कष्ट तो बहुत ज्यादा है। लड़की के छोटे-छोटे बच्चे हैं। दामाद की मृत्यु हो गई है। सारा-सारा दिन मेरी बहन इसी चिंता में रहती है। दिन में कई-कई बार यह कहती रहती है कि बेटी का क्या होगा? कैसे बच्चों का पालन करेगी?
  33. Meera Bai Got Refug...  
I have violated the order of the Guruji. I will get a scolding. If Guruji will become angry, all my service will be in vain. O God! What has happened? ” She reached the river with these thoughts. She saw that the bucket was empty, and the clothes after washing were being dried on the bushes, and they had become dry.
रामों तो सत्संग के रंग में ऐसी रंगी, जब-जब सतगुरू जी मंडली समेत आकर आश्रम में रूकते, वह तो सुबह चली जाती, देर शाम को आती और सेवा करती, बर्तन साफ करती, गुरू जी के वस्त्रा धोती। सत्संग का तो एक शब्द भी नहीं छोड़ती थी। एक समय सर्दी का मौसम था। सुबह 10 बजे सत्संग शुरू हुआ। गुरू जी ने रामों से बोला कि बेटी! वस्त्रा धो ला नदी पर। धूप थोड़ी देर रहती है, सत्संग के बाद जाएगी तो वस्त्रा सूख नहीं पाऐंगे। रामों बहन वस्त्रा बाल्टी में डालकर चल पड़ी। नदी थोड़ी दूरी पर थी। कपड़े पानी में बाल्टी में भिगोकर सोडा डाल दिया। सोचा कि जितनी देर वस्त्रा सोडा में भीगेंगे, तब तक सत्संग सुन आती हूँ। आश्रम के बाहर दीवार के साथ कान लगाकर सत्संग वचन सुनने लगी। सत्संग समापन पर ‘‘सत साहेब’’ की ध्वनि सुनी तो रामों को कपड़े याद आए। दौड़ी-दौड़ी नदी की ओर चली और डरी हुई थी कि आज तो गलती हो गई। गुरू जी के वचन की अवहेलना हो गई। मेरे ऊपर डाँट पड़ेगी। गुरू जी नाराज हो गए तो मेरी तो सेवा पर पानी फिर जाएगा। हे भगवान! यह कौन बनी? इन्हीं विचारों में नदी पर पहुँची तो देखा कि बाल्टी खाली थी और वस्त्रा धोकर झाड़ियों पर सुखा रखे थे जो सूख चुके थे। रामों उन बहनों से बोली जो पहले से नदी पर अपने वस्त्रा धो रही थी कि हे बहनों! ये वस्त्रा आपने धोकर सुखाए हैं क्या? सब अन्य महिलाऐं रामों की ओर देखने लगी। एक बोली कि बहन! तेरा दिमाग चल गया है क्या या मजाक कर रही है? आप स्वयं तो कपड़े धो रही थी बेसब्री होकर। हमारे भी छींटे लग रहे थे। तेरे को टोका भी था कि धीरे-धीरे कपड़े धो। तू खुद झाड़ियों पर सुखाकर गई थी। अब क्या भाँग का नशा कर आई है? रामों रोने लगी और सब कपड़े उठाकर बाल्टी में डालकर आश्रम की ओर चली। आश्रम में किसी सेवादार ने रामों को आश्रम के बाहर बैठे सत्संग सुनते देर तक देखा था। उसने गुरू जी को बताया कि आज आपके कपड़े गीले ही रहेंगें क्योंकि रामों तो सत्संग समापन तक बाहर दीवार के कान लगाकर सत्संग सुन रही थी। अभी गई है कपड़े धोने। इतने में रामों ने आश्रम में प्रवेश किया और कपड़े गुरू जी के पास रखकर फूट-फूटकर रोने लगी। संत जी ने कपड़े छूए तो पूर्ण रूप से सूखे थे। रामों से रोने का कारण पूछा तो बताया कि गुरू जी! आपने दुःखी होकर स्वयं कपड़े धोए हैं। मेरे से गलती हो गई। मैंने ऐसे-ऐसे सोचा था कि कुछ देर सत्संग सुनकर कपड़े धोऊँगी। परंतु ध्यान नहीं रहा। गुरू जी बोले कि बेटी! परमात्मा कबीर जी रामों बनकर कपड़े धो गए हैं।
  58. Summary of Chapter ...  
On listening to these words of mine, Khagesh’s (king of birds) eyes filled with tears, and he said, “O god! Who are you? What is your motive? You have told such a bitter truth that it is difficult to digest it. If what you have said, that there is an Immortal God in the Amarlok, is true then we have been kept in the dark. If this is false, then you deserve criticism; you are an offender. If it true, then Garud is your special servant.”
परमेश्वर कबीर जी ने धर्मदास जी को बताया कि मैंने विष्णु जी के वाहन पक्षीराज गरूड़ जी को उपदेश दिया, उसको सृष्टि रचना सुनाई। अमरलोक की कथा सत्यपुरूष की महिमा सुनकर गरूड़ देव अचम्भित हुआ। अपने कानों पर विश्वास नहीं कर रहे थे। मन-मन में विचार कर रहे थे कि मैं आज यह क्या सुन रहा हूँ? मैं कोई स्वपन तो नहीं देख रहा हूँ। मैं किसी अन्य देश में तो नहीं चला गया हूँ। जो देश और परमात्मा मैंने सुना है, वह जैसे मेरे सामने चलचित्रा रूप में चल रहा है। जब गरूड़ देव इन ख्यालों में खोए थे, तब मैंने कहा, हे पक्षीराज! क्या मेरी बातों को झूठ माना है। चुप हो गये हो। प्रश्न करो, यदि कोई शंका है तो समाधान कराओ। यदि आपको मेरी वाणी से दुःख हुआ है तो क्षमा करो। मेरे इन वचनों को सुनकर खगेश की आँखें भर आई और बोले कि हे देव! आप कौन हैं? आपका उद्देश्य क्या है? इतनी कड़वी सच्चाई बताई है जो हजम नहीं हो पा रही है। जो आपने अमरलोक में अमर परमेश्वर बताया है, यदि यह सत्य है तो हमें धोखे में रखा गया है। यदि यह बात असत्य है तो आप निंदा के पात्रा हैं, अपराधी हैं। यदि सत्य है तो गरूड़ आपका दास खास है। परमेश्वर कबीर जी ने धर्मदास जी को बताया कि मैंने कहा, हे गरूड़देव! जो शंका आपको हुई है, यह स्वाभाविक है, परंतु आपने संयम से काम लिया है। यह आपकी महानता है। परंतु मैं जो आपको अमरपुरूष तथा सत्यलोक की जानकारी दे रहा हूँ, वह परम सत्य है। मेरा नाम कबीर है। मैं उसी अमर लोक का निवासी हूँ। आपको काल ब्रह्म ने भ्रमित कर रखा है। यह ज्ञान ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव जी को भी नहीं है। आप विचार करो गरूड़ जी! जीव का जन्म होता है। आनन्द से रहने लगता है। परिवार विस्तार होता है। उसके पालन-पोषण में सांसारिक परंपराओं का निर्वाह करते-करते वृद्ध हो जाता है। जिस परिवार को देख-देखकर अपने को धन्य मानता है। उसी परिवार को त्यागकर संसार छोड़कर मजबूरन जाना पड़ता है। स्वयं भी रो रहा है, अंतिम श्वांस गिन रहा है। परिवार भी दुःखी है। यह क्या रीति है? क्या यह उचित है? गरूड़ देव बोले, हे कबीर देव! यह तो संसार का विधान है। जन्मा है तो मरना भी है। परमेश्वर जी ने कहा कि क्या कोई मरना चाहता है? क्या कोई वृद्धावस्था पसंद करता है? गरूड़ देव का उत्तर=नहीं। परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि यदि ऐसा हो कि न वृद्ध अवस्था हो, न मृत्यु तो कैसा लगे? गरूड़ देव जी ने कहा कि कहना ही क्या, ऐसा हो जाए तो आनन्द हो जाए परंतु यह तो ख्वाबी ख्याल (स्वपन विचार) जैसा है। हे धर्मदास! मैंने कहा कि वेदों तथा पुराणों को आप क्या मानते हो, सत्य या असत्य? गरूड़ देव जी ने कहा, परम सत्य।