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Herein, friends, a brother, aloof from sensuous appetites, aloof from evil ideas, enters into and abides in the First Jhāna, wherein there is initiative and sustained thought, which is born of solitude, and is full of zest and ease.
५—चार समाधि-भावना—(१) ०आविसो । (ऐसी) समाधि-भावना है, जो भावित होनेपर वृद्धि-प्राप्त होनेपर, इसी जन्ममे सुख-विहारके लिये होती है । (२) आवुसो । (ऐसी) समाधि-भावना है, जो भावित होनेपर, वृद्धि-प्राप्त होनेपर, ज्ञान-दर्शन (=साक्षात्कार) के लाभके लिये होती है । (३) आवुसो । ० स्मृति, सम्प्रजन्यके लिये होती है । (४) ० आस्रवोके क्षयके लिये होती है । आवुसो । कौनसी समाधि-भावना है, जो भावित होनेपर, बहुली-कृत (=वृद्धि-प्राप्त) होनेपर इसी जन्ममे सुख-विहारके लिये होती है ॽ आवुसो । भिक्षु ० प्रथम-ध्यान२ ०, ० द्वितीय-ध्यान ०, ० तृतीय-ध्यान ०, ० चतुर्थ ध्यानको-प्राप्त हो विहरता है । आवुसो । यह समाधि-भावना भावित होनेपर ० । (१) आवुसो । कौनसी ० जो भावित होनेपर ० ज्ञान-दर्शनके लाभके लिये होती है ॽ आवुसो । भिक्षु आलोक(=प्रकाश)-सज्ञा (=ज्ञान) मनमे करता है, दिन-सज्ञाका अधिष्ठान (=दृढ-विचार) करता है—‘जैसे दिन वैसी रात, जैसी रात वैसा दिन’ । इस प्रकार खुले, बन्धन-रहित, मनसे प्रभा-सहित चित्तकी भावना करता है । आवुसो । यह समाधि-भावना भावित होनेपर ० । (३) आवुसो । कौनसी ० जो ० स्मृति, सप्रजन्यके लिये होती है ॽ आवुसो । भिक्षुको विदित (=ज्ञानमे आई) वेदना (=अनुभव) उत्पन्न होती है, विदित (ही) ठहरती है, विदित (ही) अस्तको प्राप्त होती है । विदित सज्ञा उत्पन्न होती है, ० ठहरती ०, ० अस्त होती है । विदित वितर्क उत्पन्न ०, ठहरते०, अस्त होते है । आवुसो । यह समाधि-भावना ० स्मृति-सप्रजन्यके लिये होती (४) है । आवुसो । कौनसी है० जो आस्त्रव-क्षयके लिये होती है ॽ आवुसो । भिक्षु पॉच उपादान-स्कधोमे उदय (=उत्पत्ति)-व्यय (=विनाश)-अनुपश्यी (=देखनेवाला) हो विहरता है—‘ऐसा रूप हे, ऐसा रूपका समुदय (=उत्पत्ति), ऐसा रूपका अस्तगमन (=अस्त होना), ऐसी वेदना है ०, ऐसी सज्ञा ०, ० सस्कार ०, ० विज्ञान ० । यह आवुसो ० ।