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अन्य उदाहरण:- एक सेठ एक दिन एक संत के आश्रम में गया। संत की कृपा से उसको अच्छा लाभ हो गया। वह सेठ सेब-संतरों, केलों का बड़ा थैला भरकर गया। संत जी ने एक टोकरे में डाल दिए जिसमें फल प्रसाद रखते थे। सेठ दो दिन बाद गया तो टोकरा फलों से भरा था। कुछ प्रसाद संत ने भक्तों को बाँट दिया। कुछ भक्त फल प्रसाद लाए, वह टोकरे में डाल दिया। सेठ ने संत से कहा कि महाराज! आप फल क्यों नहीं खाते? संत जी बोले कि मेरे को मौत दिखाई देती है। इसलिए खाया नहीं जाता। सेठ ने पूछा, महाराज! कब जा रहे हो संसार से? संत जी बोले, आज से चालीस वर्ष पश्चात् मेरी मृत्यु होगी। सेठ बोले, हे महाराज! यूं तो सबने मरना है, फिर क्यों डरना? यह भी कोई बात हुई। इस तरह तो आम आदमी भी नहीं डरता। आप क्या बात कर रहे हो? सेठ जी दूसरे-तीसरे दिन आए और इसी तरह की बात करे। उस नगरी का राजा भी उस संत जी का भक्त था। संत जी ने राजा से कहा कि आपकी नगरी में किरोड़ीमल सेठ है। चंदन की लकड़ी की दुकान है। उसको फाँसी की सजा सुना दो और एक महीने बाद चांदनी चैदस को फाँसी का दिन रख दो। जेल में सेठ की कोठरी (कक्ष) में फलों की टोकरी भरी रहे तथा दूध का लोटा एक सेर (किलोग्राम) का भरा रहे। खाने को खीर, हलवा, पूरी बड़ी या सब्जी देना। राजा ने आज्ञा का पालन किया। जेल में सेठ जी को बीस दिन बंद हुए हो गए। निर्बल हो गया। संत जेल में गया। प्रत्येक बंदी से मिला। सेठ जी को देखकर संत ने पूछा, कहाँ के रहने वाले हो? क्या नाम है? सेठ बोला, हे महाराज! आपने पहचाना नहीं, मैं किरोड़ीमल हूँ चंदन की दुकान वाला। संत जी बोले, अरे किरोड़ीमल! तुम दुर्बल कैसे हो गए? कुछ खाते-पीते नहीं। अरे! फलों की टोकरी भी भरी है, दूध का लोटा भरा है। थाली में हलवा, खीर रखी है। सेठ जी बोले, हे महाराज! मौत की सजा सुना रखी है। कसम खाकर कहता हूँ कि मैं निर्दोष हूँ। बचा लो महाराज। मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं। संत जी बोले, भाई मरना तो सबने है। फिर क्या डरना। खा-पीकर मौज कर। सेठ जी ने सलाखों में से हाथ निकालकर चरण पकड़ लिए। बोला, बचा लो महाराज! कुछ ना खाया-पीया जाता, चांदनी चैदस दीखै सै। संत ने कहा, सेठ किरोड़ीमल! जैसे आज तेरे को चांदनी चैदस को मृत्यु निश्चित दिखाई दे रही है, इसी प्रकार साधु-संतों को अपनी चांदनी चैदस दिखाई देती है, चाहे चालीस वर्ष बाद हो।
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